Dhat Rog Ke Upchar

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धात रोग के उपचार

धात रोग क्या है?

वीर्य प्रमेह, धातु गिरना और अंग्रेजी में स्परमेटोरिया(Spermatorrhoea) ये एक ही रोग के नाम हैं जिसे धातु रोग अथवा धात रोग भी कहते हैं। इस रोग में बिना संभोग की इच्छा के भी मल-मूत्र के दौरान हल्का-सा दबाव के दौरान अण्डे की सफेदी के समान या लेसदार तरल पुरूष के शिश्न मुख से आने लगता है। इस समस्या को ही धात रोग व वीर्य प्रमेह कहते हैं।

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धात गिरना के कारण-

धात गिरना की समस्या में निम्न कारण हो सकते हैं जैसे- बुरे विचार, वीर्य का अधिक देर तक स्थिर रहना, उत्तेजक और गरम वस्तुओं का ज्यादा इस्तेमाल करना, वीर्य में गर्मी की अधिकता, पानी समान पतला वीर्य, वीर्य की थैलियों में कसाव, हस्तमैथुन करना, अधिक संभोग करना, अलग-अलग स्त्रियों से मैथुन करना, सुज़ाक, घोड़े या फिर साइकिल की सवारी करना, पेट में कीड़े होना, मूत्र मार्ग की खराश, कब्ज़ की शिकायत रहना आदि कई कारण हो सकते हैं।

वीर्य की अधिकता- वीर्य प्रमेह का कारण हो तो वीर्य अधिक मात्रा में निकलता है और वीर्य के निकलने से किसी प्रकार की कमजोरी महसूस नहीं होती। यदि वीर्य की गर्मी रोग का कारण हो तो वीर्य पतला और पीला निकलता है। वीर्य निकलने के बाद मूत्र मार्ग में जलन प्रतीत होती है और मूत्र भी जलकर आता है। वीर्य के पतले हो जाने के कारण यह रोग हो तो वीर्य पतला और सफेद रंग का होता है। उसमें शुक्रकीटों की संख्या कम और तरल अधिक होता है। वीर्य की थैलियों में ऐंठन होने से वीर्य प्रमेह हो तो मामूली उत्तेजना से वीर्य निकल जाता है। हस्तमैथुन, बच्चाबाजी, मैथुन की अधिकता, कब्ज़, बुरे विचार, वृक्कों की कमजोरी और सुज़ाक आदि के कारण यह रोग हो तो उपरोक्त लक्षणों और रोगों की प्रधानता के लक्षण होंगे।

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प्राॅस्टेटोरिया(Prostatorrhoea) की दशा में सुज़ाक जैसा तरल(बूंदे) साधारण कामेच्छा और जरा-सी छेड़छाड़ से निकलने लगती हैं। ये बूंदे बिना इच्छा के मल-मूत्र त्याग करते समय या वैसे ही निकलती रहती हैं और यह रोग विशेष रूप से शीघ्रपतन का कारण होता है। प्राॅस्टेटोरिया से इतनी अधिक कमजोरी नहीं होती जितनी वीर्य प्रमेह से होती है। परन्तु यह रोग बढ़ जाये और अधिक समय तक रहे, तो मर्दाना कमज़ोरी और स्नायु दुर्बलता उत्पन्न हो जाती है।

यूरेथ्रोरिया(Urethrorrhea)- इस रोग में अण्डे की सफेदी जैसी साफ बूंदे करने के पश्चात् मूत्र के छेद से निकलती है।

निरीक्षण-

निकलने वाले तरल का सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा निरीक्षण करायें क्योंकि उचित निरीक्षण का यही एक उपाय है। वीर्य प्रमेह की दशा में तरल के अंदर शुक्रकीट पाये जाते हैं, परन्तु बाकी दोनों अवस्थाओं में ऐसा नहीं होता है। इसके अतिरिक्त वीर्य निकलते समय मूत्रमार्ग में थोड़ी-सी सुरसुराहट प्रतीत होती है और उसकी मात्रा भी अधिक होती है, परन्तु प्राॅस्टेटोरिया और यूरेथ्रोरिया में ऐसा नहीं होता। इसलिए यह बहुत अच्छा होगा कि प्रत्येक दशा में रोग की चिकित्सा करें। केवल रोगी को यह कह देने से कि उसको वीर्य प्रमेह का रोग है, चिकित्सक को विश्वास नहीं कर लेना चाहिए, क्योंकि अधिकतर रोगियों को यकृत के दोष और पाचन विकारों के कारण मूत्र में फाॅस्टेट आने लग जाता है या पुराने सुज़ाक में घाव उत्पन्न होने के पश्चात जबकि मूत्र की जलन कम हो जाती है और पीप निकलने लगता है, तो इन दशाओं को भी रोगी भूल से धात रोग व वीर्य प्रमेह समझ लेता है।

धात रोग के आयुर्वेदिक उपाय-

Dhat Rog Ke Upchar

1. तालमखाना के बीज 60 ग्राम के ताजे अदरक के रस में तीन बार गीला और शुष्क करके बारीक पीसकर मधु मिलाकर पाक बनाकर चौड़े मुंह के जार में बंद करके गेहूं के ढेर में 15 दिन तक दबाकर रख लें। 12 ग्राम दवा सुबह-शाम गाय के दूध के साथ खिलायें। आमाशय और आंतड़ियों को शक्ति देती है, वीर्य प्रमेह, स्वप्नदोष और वीर्य दोषों को दूर करती है।

2. इमली के बीजों की गिरी को पीसकर बढ़ वृक्ष का दूध डालकर 12 घंटे तक खरल करते रहें। तब मटर के बराबर गोलियां बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम गाय के दूध के साथ रोगी को खिलायें। उपर्युक्त समस्त रोगों में बहुत ही सफल योग है।

3. बबूल(कीकर) के पत्तों को छाया में सुखाकर उसमें असगंध का चूर्ण मिलाकर बराबर पिसी खांड मिला लें। 6 से 9 ग्राम दवा सुबह-शाम गाय के दूध के साथ खिलाते रहें। वीर्य प्रमेह और दूसरे वीर्य दोषों में बहुत ही अनुभूत दवा है।

4. बबूल वृक्ष की कच्ची फलियां जिनमें अभी तक बीज न पड़े हों, छाया में शुष्ट करके बारीक पीसकर पिसी खांड मिलाकर रख लें। 6 ग्राम दवा सुबह-शाम गाय के दूध के साथ उपरोक्त रोगों में खिलायें।

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5. काली मिर्च, ग्वारपाठे का गूदा, सेंधा नमक और असली घी मिलाकर सेवन करने से सभी प्रकार के प्रमेहों में बहुत आराम पहुंचता है।

6. शिलाजीत शुद्ध, शंखपुष्पी, छोटी इलायची के बीज और मिश्री समान भाग लेकर कूट-कपड़छन चूर्ण करें।
मात्रा- 3-4 ग्राम चूर्ण को पानी के साथ दिन में दो बार सेवन करें। कुछ दिनों के प्रयोग से सब प्रकार के प्रमेहों में लाभ होता है।

7. तुलसी के बीज कूट-कपड़छन करें। इनका सेवन ताजा पानी के साथ अथवा लक्षणानुसार उचित अनुपान के साथ करने से धात रोग व स्वप्नदोष समाप्त हो जाता है।

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